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mahabharat 3.161.26-27h: उन घोड़ों की हिनहिनाहट विजय का प्रतीक थी। उनमें से प्रत्येक घोड़ा हिनहिनाकर दूसरों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करता था। उस विशाल रथ पर आरूढ़ होकर परम तेजस्वी राजा कुबेर देवताओं और गंधर्वों के मुख से अपनी स्तुति सुनकर आगे बढ़े। 26 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 3.161: कुबेरका गन्धमादन पर्वतपर आगमन और युधिष्ठिरसे उनकी भेंट   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 161: कुबेरका गन्धमादन पर्वतपर आगमन और युधिष्ठिरसे उनकी भेंट  »  श्लोक 26-27h
 
 
श्लोक  3.161.26-27h 
ह्रेषयामासुरन्योन्यं ह्रेषितैर्विजयावहै:।
स तमास्थाय भगवान् राजराजो महारथम्॥ २६॥
प्रययौ देवगन्धर्वै: स्तूयमानो महाद्युति:।
 
 
अनुवाद
उन घोड़ों की हिनहिनाहट विजय का प्रतीक थी। उनमें से प्रत्येक घोड़ा हिनहिनाकर दूसरों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करता था। उस विशाल रथ पर आरूढ़ होकर परम तेजस्वी राजा कुबेर देवताओं और गंधर्वों के मुख से अपनी स्तुति सुनकर आगे बढ़े। 26 1/2॥
 
The neighing sound of those horses was a sign of victory. Each of those horses neighed and inspired the others to do the same. Mounted on that huge chariot, the most brilliant king, Lord Kuber, proceeded hearing his praise from the mouths of the gods and the Gandharvas. 26 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)