श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 161: कुबेरका गन्धमादन पर्वतपर आगमन और युधिष्ठिरसे उनकी भेंट  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  3.161.1-2 
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा बहुविधै: शब्दैर्नाद्यमानां गिरेर्गुहाम्।
अजातशत्रु: कौन्तेयो माद्रीपुत्रावुभावपि॥ १॥
धौम्य: कृष्णा च विप्राश्च सर्वे च सुहृदस्तथा।
भीमसेनमपश्यन्त: सर्वे विमनसोऽभवन्॥ २॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! उस समय उस पर्वत की गुफा नाना प्रकार के शब्दों से गूंज रही थी। उस प्रतिध्वनि को सुनकर अजातशत्रु कुन्तीकुमार युधिष्ठिर, माद्री के दोनों पुत्र नकुल-सहदेव, पुरोहित धौम्य, द्रौपदी तथा समस्त ब्राह्मण और हितैषी- ये सभी भीमसेन को न देखकर अत्यन्त दुःखी हो गये।
 
Vaishampayanji says- Janamejaya! At that time the cave of that mountain was resonating with different types of words. Hearing that echo, Ajatashatru Kuntikumar Yudhishthir, both Madri's sons Nakul-Sahdev, priest Dhaumya, Draupadi and all the brahmins and well-wishers - all of them became very sad due to not seeing Bhimsen. 1-2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)