श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 160: पाण्डवोंका आर्ष्टिषेणके आश्रमपर निवास, द्रौपदीके अनुरोधसे भीमसेनका पर्वतके शिखरपर जाना और यक्षों तथा राक्षसोंसे युद्ध करके मणिमान‍्का वध करना  »  श्लोक 38-39
 
 
श्लोक  3.160.38-39 
प्राकारेण परिक्षिप्तं सौवर्णेन समन्तत:।
सर्वरत्नद्युतिमता सर्वोद्यानवता तथा॥ ३८॥
शैलादभ्युच्छ्रयवता चयाट्टालकशोभिना।
द्वारतोरणनिर्व्यूहध्वजसंवाहशोभिना॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
उसके चारों ओर सोने की एक दीवार थी। उसमें तरह-तरह के रत्न जड़े हुए थे और उनकी चमक फैलती रहती थी। दीवार के चारों ओर सुंदर बगीचे थे। उस दीवार की ऊँचाई किसी पर्वत से भी अधिक थी। वह अनेक भवनों और मीनारों से सुशोभित थी। द्वार, गोपुर, मीनारें और अनेक ध्वजाएँ उसकी शोभा बढ़ा रही थीं।
 
There was a boundary wall of gold around it. All kinds of gems were embedded in it and their radiance kept spreading. There were beautiful gardens on all sides of the boundary wall. The height of that boundary wall was more than that of a mountain. It was being adorned with many buildings and towers. Gates, arches (gopur), towers and a host of flags were enhancing its beauty. 38-39.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)