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श्री महाभारत
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पर्व 3: वन पर्व
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अध्याय 160: पाण्डवोंका आर्ष्टिषेणके आश्रमपर निवास, द्रौपदीके अनुरोधसे भीमसेनका पर्वतके शिखरपर जाना और यक्षों तथा राक्षसोंसे युद्ध करके मणिमान्का वध करना
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श्लोक 34
श्लोक
3.160.34
न ग्लानिर्न च कातर्यं न वैक्लव्यं न मत्सर:।
कदाचिज्जुषते पार्थमात्मजं मातरिश्वन:॥ ३४॥
अनुवाद
वायुपुत्र कुन्तीकुमार भीमसेन को ग्लानि, लज्जा, चिन्ता और ईर्ष्या आदि भावनाएँ कभी स्पर्श नहीं करती थीं ॥34॥
Vayu's son Kuntikumar Bhimsen was never touched by feelings of guilt, shyness, anxiety and jealousy etc. 34॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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