श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 16: शाल्वकी विशाल सेनाके आक्रमणका यादवसेनाद्वारा प्रतिरोध, साम्बद्वारा क्षेमवृद्धिकी पराजय, वेगवान‍्का वध तथा चारुदेष्णद्वारा विविन्ध्य दैत्यका वध एवं प्रद्युम्नद्वारा सेनाको आश्वासन  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  3.16.31 
अहं सौभपते: सेनामायसैर्भुजगैरिव।
धनुर्भुजविनिर्मुक्तैर्नाशयाम्यद्य यादवा:॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
'यादववंशियो! मैं अभी अपने धनुष से छोड़े हुए लोहे के सर्प के समान बाणों द्वारा सौभपति शाल्व की सेना का संहार करने जा रहा हूँ।' ॥31॥
 
'Yadavvanshis! I am going to destroy the army of Saubhapati Shalva right now with the iron serpent-like arrows shot from my bow.' ॥ 31॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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