श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 158: नर-नारायण-आश्रमसे वृषपर्वाके यहाँ होते हुए राजर्षि आर्ष्टिषेणके आश्रमपर जाना  »  श्लोक 99-101h
 
 
श्लोक  3.158.99-101h 
कलहंसगणैर्जुष्टामृषिकिन्नरसेविताम्।
धातुभिश्च सरिद्भिश्च किन्नरैर्मृगपक्षिभि:॥ ९९॥
गन्धर्वैरप्सरोभिश्च काननैश्च मनोरमै:।
व्यालैश्च विविधाकारै: शतशीर्षै: समन्तत:॥ १००॥
उपेतं पश्य कौन्तेय शैलराजमरिन्दम।
 
 
अनुवाद
यहाँ हंसों और ऋषियों के समुदाय रहते हैं और किन्नरगण सदैव इसका (गंगाजी का) सेवन करते हैं। हे शत्रुनाशक भीम! नाना प्रकार की धातुओं, नदियों, किन्नरों, मृगों, पक्षियों, गन्धर्वों, अप्सराओं, सुन्दर कानों और नाना प्रकार के सौ मुख वाले सर्पों से युक्त इस पर्वतराज का दर्शन करो।॥ 99-100 1/2॥
 
'Here live communities of swans and sages and Kinnargans always consume this (Gangaji). O enemy-destroyer Bhima! Visit this mountain king endowed with various metals, rivers, Kinnars, deer, birds, Gandharvas, Apsaras, beautiful ears and various types of serpents with hundred heads.'॥ 99-100 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)