श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 158: नर-नारायण-आश्रमसे वृषपर्वाके यहाँ होते हुए राजर्षि आर्ष्टिषेणके आश्रमपर जाना  »  श्लोक 96-97h
 
 
श्लोक  3.158.96-97h 
एते बहुविधा: शैलं शोभयन्ति महाप्रभा:।
गन्धर्वा: सह कान्ताभिर्यथोक्तं वृषपर्वणा॥ ९६॥
दृश्यन्ते शैलशृङ्गेषु पार्थ किम्पुरुषै: सह।
 
 
अनुवाद
ये नाना प्रकार की अत्यंत प्रकाशमान धातुएँ सम्पूर्ण शिला की शोभा बढ़ाती हैं। पार्थ! जैसा वृषपर्वा ने कहा था, इन पर्वत शिखरों पर गंधर्व अपनी प्रिय अप्सराओं और किम्पुरुषों के साथ दिखाई देते हैं। 96 1/2॥
 
‘These various types of extremely luminous metals enhance the beauty of the entire rock. Parth! Just as Vrishparva had said, Gandharvas are visible with their beloved Apsaras and Kimpurushas on these mountain peaks. 96 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)