श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 158: नर-नारायण-आश्रमसे वृषपर्वाके यहाँ होते हुए राजर्षि आर्ष्टिषेणके आश्रमपर जाना  »  श्लोक 95
 
 
श्लोक  3.158.95 
शशलोहितवर्णाभा: क्वचिद्‍गैरिकधातव:।
सितासिताभ्रप्रतिमा बालसूर्यसमप्रभा:॥ ९५॥
 
 
अनुवाद
गेरु नामक एक धातु है, जिसकी चमक लाल खरगोश के समान है। कुछ धातुएँ श्वेत मेघों के समान होती हैं, तो कुछ काले मेघों के समान। कुछ प्रातःकाल के सूर्य के समान लाल रंग की होती हैं॥95॥
 
‘There is a metal called Geru, whose lustre looks like that of a red rabbit. Some metals are like white clouds, while others are like black clouds. Some are red in colour like the morning sun.॥ 95॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)