श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 158: नर-नारायण-आश्रमसे वृषपर्वाके यहाँ होते हुए राजर्षि आर्ष्टिषेणके आश्रमपर जाना  »  श्लोक 91-92h
 
 
श्लोक  3.158.91-92h 
बहुतालसमुत्सेधा: शैलशृङ्गपरिच्युता:॥ ९१॥
नानाप्रस्रवणेभ्यश्च वारिधारा: पतन्ति च।
 
 
अनुवाद
‘अनेक झरनों से जल की धाराएँ गिर रही हैं, जिनकी ऊँचाई अनेक ताड़ के वृक्षों के बराबर है और वे पर्वत के सर्वोच्च शिखर से नीचे गिरती हैं।॥91 1/2॥
 
‘Streams of water are falling from numerous waterfalls, whose height is equal to many palm trees and they fall down from the highest peak of the mountain.॥ 91 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)