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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 158: नर-नारायण-आश्रमसे वृषपर्वाके यहाँ होते हुए राजर्षि आर्ष्टिषेणके आश्रमपर जाना  »  श्लोक 84-85h
 
 
श्लोक  3.158.84-85h 
अमानुषगतिं प्राप्ता: संसिद्धा: स्म वृकोदर।
लताभि: पुष्पिताग्राभि: पुष्पिता: पादपोत्तमा:॥ ८४॥
संश्लिष्टा: पार्थ शोभन्ते गन्धमादनसानुषु।
 
 
अनुवाद
'वृकोदर! हम ऐसे स्थान पर पहुँच गए हैं, जो मनुष्यों के लिए दुर्गम है। ऐसा प्रतीत होता है कि हमें सिद्धि प्राप्त हो गई है। कुन्तीपुत्र! गंधमादन के शिखरों पर पुष्पों से लदे हुए ये उत्तम वृक्ष, इन पुष्पित लताओं से सुशोभित होकर कितने सुन्दर दिख रहे हैं?॥ 84 1/2॥
 
'Vrikodara! We have reached a place which is inaccessible to humans. It seems that we have attained perfection. Kunti's son! How beautiful these excellent trees full of flowers on the peaks of Gandhamadan are looking, decorated with these flowering creepers?॥ 84 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)