श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 158: नर-नारायण-आश्रमसे वृषपर्वाके यहाँ होते हुए राजर्षि आर्ष्टिषेणके आश्रमपर जाना  »  श्लोक 78
 
 
श्लोक  3.158.78 
वने ह्यस्मिन् मनोरम्ये दिव्या: काननजा द्रुमा:।
लताश्च विविधाकारा: पत्रपुष्पफलोपगा:॥ ७८॥
 
 
अनुवाद
इस सुन्दर वन के वृक्ष और नाना प्रकार की लताएँ दिव्य हैं। उन सभी में प्रचुर मात्रा में पत्ते, फूल और फल हैं। 78.
 
‘The trees and various types of creepers of this beautiful forest are divine. All of them have abundance of leaves, flowers and fruits. 78.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)