श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 158: नर-नारायण-आश्रमसे वृषपर्वाके यहाँ होते हुए राजर्षि आर्ष्टिषेणके आश्रमपर जाना  »  श्लोक 77
 
 
श्लोक  3.158.77 
ततो युधिष्ठिरो भीममाहेदं प्रीतिमद् वच:।
अहो श्रीमदिदं भीम गन्धमादनकाननम्॥ ७७॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् युधिष्ठिर ने प्रसन्नतापूर्वक भीमसेन से यह कहा - 'भीम! यह गन्धमादन कानन कितना सुन्दर और अद्भुत है?'॥
 
Thereafter, Yudhishthir said this happily to Bhimsen - 'Bhim! How beautiful and wonderful is this Gandhamadana Kanan? 7 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)