श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 158: नर-नारायण-आश्रमसे वृषपर्वाके यहाँ होते हुए राजर्षि आर्ष्टिषेणके आश्रमपर जाना  »  श्लोक 76
 
 
श्लोक  3.158.76 
कमलोत्पलकह्लारपुण्डरीकसुगन्धिना।
सेव्यमाना वने तस्मिन् सुखस्पर्शेन वायुना॥ ७६॥
 
 
अनुवाद
उस समय कमल, उत्पल, कहलर और पुण्डरीक की सुन्दर सुगन्धि लेकर आने वाली मृदुल वायु उन्हें वन में झुलाती हुई प्रतीत हो रही थी।
 
At that time the gentle sweet wind carrying the beautiful fragrance of the Lotus, Utpala, Kahlar and Pundarik seemed to be swaying them in the forest. 76.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)