श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 158: नर-नारायण-आश्रमसे वृषपर्वाके यहाँ होते हुए राजर्षि आर्ष्टिषेणके आश्रमपर जाना  »  श्लोक 74-75
 
 
श्लोक  3.158.74-75 
एवं क्रमेण ते वीरा वीक्षमाणा: समन्तत:।
गन्धवन्त्यथ माल्यानि रसवन्ति फलानि च॥ ७४॥
सरांसि च मनोज्ञानि वृक्षांश्चातिमनोरमान्।
विविशु: पाण्डवा: सर्वे विस्मयोत्फुल्ललोचना:॥ ७५॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार वीर पाण्डव गंधमादन पर्वत के वन में प्रवेश कर गए और चारों ओर सुगन्धित पुष्पमालाएँ, स्वादिष्ट फल, सुन्दर सरोवर और वृक्षों के वन देखकर उनके नेत्र आश्चर्य से चमक उठे।
 
Thus the valiant Pandavas entered the forest of Gandhamadana mountain, seeing fragrant garlands of flowers, delicious fruits, beautiful lakes and groves of trees all around. On reaching there, their eyes lit up with wonder. 74-75.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)