श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 158: नर-नारायण-आश्रमसे वृषपर्वाके यहाँ होते हुए राजर्षि आर्ष्टिषेणके आश्रमपर जाना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  3.158.30 
नानामृगगणैर्जुष्टं कौन्तेय: सत्यविक्रम:।
पदातिर्भ्रातृभि: सार्धं प्रातिष्ठत युधिष्ठिर:॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
तब कुन्तीपुत्र और पराक्रमी युधिष्ठिर अपने भाइयों के साथ वृषपर्वा द्वारा बताये गये मार्ग पर पैदल चल पड़े, जो नाना प्रकार के मृगों के झुंडों से भरा हुआ था।
 
Then Yudhishthira, the son of Kunti and valiant, set out on foot along with his brothers on the path shown by Vrishaparva, which was filled with herds of deer of various species.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)