श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 158: नर-नारायण-आश्रमसे वृषपर्वाके यहाँ होते हुए राजर्षि आर्ष्टिषेणके आश्रमपर जाना  »  श्लोक 19-21
 
 
श्लोक  3.158.19-21 
ददृशु: पाण्डवा राजन् गन्धमादनमन्तिकात्।
पृष्ठे हिमवत: पुण्ये नानाद्रुमलतावृते॥ १९॥
सलिलावर्तसंजातै: पुष्पितैश्च महीरुहै:।
समावृतं पुण्यतममाश्रमं वृषपर्वण:॥ २०॥
तमुपागम्य राजर्षिं धर्मात्मानमरिन्दमा:।
पाण्डवा वृषपर्वाणमवन्दन्त गतक्लमा:॥ २१॥
 
 
अनुवाद
राजन! वहाँ पाण्डवों ने गंधमादन पर्वत को निकट से देखा। हिमालय का वह पवित्र पृष्ठ नाना प्रकार के वृक्षों और लताओं से आच्छादित था। वहाँ वृषपर्वा का परम पवित्र आश्रम था, जो जल से सींचे हुए पुष्पित वृक्षों से घिरा हुआ था। शत्रुदमन पाण्डवों ने उस पुण्यात्मा राजा वृषपर्वा के पास जाकर उन्हें बिना किसी कष्ट के प्रणाम किया॥19-21॥
 
King! There the Pandavas saw the Gandhamadan mountain from close. That sacred back side of the Himalayas was covered with various kinds of trees and creepers. There was the most sacred hermitage of Vrishparva surrounded by flowering trees that grew by irrigating with water. The Shatrudaman Pandavas went to that virtuous King Vrishparva and bowed down to him without any trouble.॥19-21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)