श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 158: नर-नारायण-आश्रमसे वृषपर्वाके यहाँ होते हुए राजर्षि आर्ष्टिषेणके आश्रमपर जाना  »  श्लोक 101
 
 
श्लोक  3.158.101 
वैशम्पायन उवाच
ते प्रीतमनस: शूरा: प्राप्ता गतिमनुत्तमाम्॥ १०१॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - इस प्रकार वे वीर पाण्डव हर्षित मन से अपने उत्तम गंतव्य पर पहुँचे ॥101॥
 
Vaishampayanji says – In this way, those brave Pandavas reached their most excellent destination with a joyful heart. 101॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)