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mahabharat 3.157.72: वह मस्तक, जिसके होठ दाँतों से दबे हुए थे, रक्त से लथपथ होकर गिर पड़ा था। इस प्रकार जटासुर का वध करके महाधनुर्धर भीमसेन युधिष्ठिर के पास आए। उस समय श्रेष्ठ ब्राह्मण उनकी बहुत प्रशंसा कर रहे थे, मानो मरुद्गण देवराज इन्द्र की स्तुति गा रहे हों।   |   mahabharat अध्याय 3.157: जटासुरके द्वारा द्रौपदीसहित युधिष्ठिर,नकुल, सहदेवका हरण तथा भीमसेनद्वारा जटासुरका वध   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 157: जटासुरके द्वारा द्रौपदीसहित युधिष्ठिर,नकुल, सहदेवका हरण तथा भीमसेनद्वारा जटासुरका वध  »  श्लोक 72
 
 
श्लोक  3.157.72 
पपात रुधिरादिग्धं संदष्टदशनच्छदम्।
तं निहत्य महेष्वासो युधिष्ठिरमुपागमत्।
स्तूयमानो द्विजाग्रॺैस्तु मरुद्भिरिव वासव:॥ ७२॥
 
 
अनुवाद
वह मस्तक, जिसके होठ दाँतों से दबे हुए थे, रक्त से लथपथ होकर गिर पड़ा था। इस प्रकार जटासुर का वध करके महाधनुर्धर भीमसेन युधिष्ठिर के पास आए। उस समय श्रेष्ठ ब्राह्मण उनकी बहुत प्रशंसा कर रहे थे, मानो मरुद्गण देवराज इन्द्र की स्तुति गा रहे हों।
 
That head with the lips pressed by the teeth had fallen soaked in blood. Having killed Jatasura in this manner, the great archer Bhimasena came to Yudhishthira. At that time the best Brahmins were praising him profusely, as if the Maruts were singing the praises of the king of gods, Indra.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)