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mahabharat 3.157.65: तत्पश्चात्, अपने बल के गर्व से भरे हुए दोनों वीर एक दूसरे की ओर दौड़े और पुनः अपने विरोधियों को अपनी भुजाओं से कसकर खींचने लगे, जैसे दो हाथी आपस में लड़ते हुए एक दूसरे को खींचते हैं।   |   mahabharat अध्याय 3.157: जटासुरके द्वारा द्रौपदीसहित युधिष्ठिर,नकुल, सहदेवका हरण तथा भीमसेनद्वारा जटासुरका वध   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 157: जटासुरके द्वारा द्रौपदीसहित युधिष्ठिर,नकुल, सहदेवका हरण तथा भीमसेनद्वारा जटासुरका वध  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  3.157.65 
अभिद्रुत्य च भूयस्तावन्योन्यं बलदर्पितौ।
भुजाभ्यां परिगृह्याथ चकर्षाते गजाविव॥ ६५॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात्, अपने बल के गर्व से भरे हुए दोनों वीर एक दूसरे की ओर दौड़े और पुनः अपने विरोधियों को अपनी भुजाओं से कसकर खींचने लगे, जैसे दो हाथी आपस में लड़ते हुए एक दूसरे को खींचते हैं।
 
Thereafter, both the heroes, full of pride of their strength, rushed towards each other and once again began pulling their opponents tightly with their arms, like two elephants fighting each other, pulling each other.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)