श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 157: जटासुरके द्वारा द्रौपदीसहित युधिष्ठिर,नकुल, सहदेवका हरण तथा भीमसेनद्वारा जटासुरका वध  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  3.157.45 
बडिशोऽयं त्वया ग्रस्त: कालसूत्रेण लम्बित:।
मत्स्योऽम्भसीव स्यूतास्य: कथमद्य भविष्यसि॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
तूने मृत्युरूपी डोरी से लटकी हुई बाँसुरी का काँटा निगल लिया है। तेरा मुँह उस काँटे में जल में मछली की भाँति फँसा हुआ है, अतः अब तू जीवन कैसे धारण करेगा?॥ 45॥
 
‘You have swallowed the hook of the flute hung from the string of death. Your mouth is entangled in that hook like a fish in water, so how will you sustain life now?॥ 45॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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