श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 157: जटासुरके द्वारा द्रौपदीसहित युधिष्ठिर,नकुल, सहदेवका हरण तथा भीमसेनद्वारा जटासुरका वध  »  श्लोक 42-43
 
 
श्लोक  3.157.42-43 
प्रियेषु रममाणं त्वां न चैवाप्रियकारिणम्।
अतिथिं ब्रह्मरूपं च कथं हन्यामनागसम्॥ ४२॥
राक्षसं जानमानोऽपि यो हन्यान्नरकं व्रजेत्।
अपक्वस्य च कालेन वधस्तव न विद्यते॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
'तुम हमारे प्रिय कार्यों में ही मन लगाते थे। तुमने कभी ऐसा कुछ नहीं किया जो हमें पसंद न हो। तुम ब्राह्मण अतिथि के रूप में आए थे और तुमने कभी कोई अपराध नहीं किया। ऐसी स्थिति में मैं तुम्हें कैसे मार सकता था? जो व्यक्ति बिना किसी अपराध के राक्षस को राक्षस जानकर मारता है, वह नरक में जाता है। तुम्हारा समय अभी समाप्त नहीं हुआ था, इसीलिए आज से पहले तुम्हारा वध नहीं हो सका।' 42-43
 
‘You used to concentrate on our favourite works. You never did anything that we did not like. You came as a Brahmin guest and never committed any crime. In such a condition how could I kill you? One who kills a demon knowing him to be a demon without any crime goes to hell. Your time was not over yet, that is why you could not be killed before today. 42-43.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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