|
| |
| |
श्लोक 3.156.20-21  |
ततो युधिष्ठिरो राजा प्रतिजग्राह तद् वच:।
प्रत्यागम्य पुनस्तं तु नरनारायणाश्रमम्॥ २०॥
भीमसेनादिभि: सर्वैर्भ्रातृभि: परिवारित:।
पाञ्चाल्या ब्राह्मणाश्चैव न्यवसन्त सुखं तदा॥ २१॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| तत्पश्चात् राजा युधिष्ठिर उस दिव्य वाणी को स्वीकार करके नर-नारायण के आश्रम में लौट आये और भीमसेन तथा द्रौपदी सहित अपने समस्त भाइयों के साथ वहीं रहने लगे। उस समय उनके साथ आये हुए ब्राह्मण भी वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे। |
| |
| Thereafter King Yudhishthira accepted the divine voice and returned to the hermitage of Nara-Narayana and started living there with all his brothers including Bhimasena and Draupadi. The Brahmins who had accompanied him at that time also started living there happily. |
| |
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां पुनर्नरनारायणाश्रमागमने षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १५६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें पाण्डवोंका पुन: नर-नारायणके आश्रममें आगमनविषयक एक सौ छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १५६॥
|
| |
| ✨ ai-generated |
| |
|