श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 155: भयंकर उत्पात देखकर युधिष्ठिर आदिकी चिन्ता और सबका गन्धमादन-पर्वतपर सौगन्धिकवनमें भीमसेनके पास पहुँचना  »  श्लोक 29-34
 
 
श्लोक  3.155.29-34 
पुनरेवं न कर्तव्यं मम चेदिच्छसि प्रियम्।
अनुशिष्य तु कौन्तेयं पद्मानि परिगृह्य च॥ २९॥
तस्यामेव नलिन्यां तु विजह्रुरमरोपमा:।
एतस्मिन्नेव काले तु प्रगृहीतशिलायुधा:॥ ३०॥
प्रादुरासन् महाकायास्तस्योद्यानस्य रक्षिण:।
ते दृष्ट्वा धर्मराजानं महर्षिं चापि लोमशम्॥ ३१॥
नकुलं सहदेवं च तथान्यान् ब्राह्मणर्षभान्।
विनयेन नता: सर्वे प्रणिपत्य च भारत॥ ३२॥
सान्त्विता धर्मराजेन प्रसेदु: क्षणदाचरा:।
विदिताश्च कुबेरस्य तत्र ते कुरुपुङ्गवा:॥ ३३॥
ऊषुर्नातिचिरं कालं रममाणा: कुरूद्वहा:।
प्रतीक्षमाणा बीभत्सुं गन्धमादनसानुषु॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
‘यदि तुम मुझसे प्रेम करना चाहते हो, तो ऐसा काम मत करो।’ भीमसेन को ऐसी सलाह देकर वे पूर्वोक्त सुगन्धित कमल लेकर वे देवोपम पाण्डव उसी सरोवर के तट पर इधर-उधर विचरण करने लगे। उसी समय वहाँ बहुत से विशाल उद्यानरक्षक पत्थरों को अस्त्र रूप में धारण किए हुए प्रकट हुए। उन्होंने धर्मराज युधिष्ठिर, महर्षि लोमश, नकुल-सहदेव तथा अन्य श्रेष्ठ ब्राह्मणों को नम्रतापूर्वक प्रणाम किया। तब धर्मराज युधिष्ठिर ने उन्हें सान्त्वना दी। इससे वे दैत्य (राक्षस) प्रसन्न हुए। तदनन्तर वे कुरुप्रवर पाण्डव धनपति कुबेर के ज्ञान में कुछ समय तक वहाँ सुखपूर्वक रहे और गन्धमादन पर्वत की चोटियों पर अर्जुन के आगमन की प्रतीक्षा करते रहे।
 
‘If you want to love me, then do not do such a thing.’ After giving such advice to Bhimsen, he took the aforesaid fragrant lotus and those Devopam Pandavas started wandering here and there on the banks of the same lake. At the same time, many giant garden guards appeared there, adopting the stones as weapons. India He humbly bowed to Dharmaraja Yudhishthir, Maharishi Lomash, Nakul-Sahdev and other great Brahmins. Then Dharmaraja Yudhishthir consoled him. Due to this those demons (demons) became happy. Thereafter, those Kurupravra Pandavas stayed there happily for some time in the knowledge of Kuber, the wealth leader, and kept waiting for the arrival of Arjuna on the peaks of Gandhamadan mountain. 29-34॥
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां सौगन्धिकाहरणे पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १५५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें सौगन्धिकाहरणविषयक एक सौ पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १५५॥

 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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