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mahabharat 3.155.27: उन्हें देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो यमराज अपनी प्रजा का संहार करते समय हाथ में दण्ड लिए खड़े हों। भीमसेन को उस अवस्था में देखकर धर्मराज ने उन्हें बारंबार हृदय से लगा लिया॥ 27॥   |   mahabharat अध्याय 3.155: भयंकर उत्पात देखकर युधिष्ठिर आदिकी चिन्ता और सबका गन्धमादन-पर्वतपर सौगन्धिकवनमें भीमसेनके पास पहुँचना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 155: भयंकर उत्पात देखकर युधिष्ठिर आदिकी चिन्ता और सबका गन्धमादन-पर्वतपर सौगन्धिकवनमें भीमसेनके पास पहुँचना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  3.155.27 
प्रजासंक्षेपसमये दण्डहस्तमिवान्तकम्।
तं दृष्ट्वा धर्मराजस्तु परिष्वज्य पुन: पुन:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
उन्हें देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो यमराज अपनी प्रजा का संहार करते समय हाथ में दण्ड लिए खड़े हों। भीमसेन को उस अवस्था में देखकर धर्मराज ने उन्हें बारंबार हृदय से लगा लिया॥ 27॥
 
Looking at him it appeared as if Yamaraja was standing there with a stick in his hand at the time of killing his subjects. Seeing Bhimasena in that state, Dharmaraj embraced him again and again.॥ 27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)