श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 155: भयंकर उत्पात देखकर युधिष्ठिर आदिकी चिन्ता और सबका गन्धमादन-पर्वतपर सौगन्धिकवनमें भीमसेनके पास पहुँचना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.155.1 
वैशम्पायन उवाच
ततस्तानि महार्हाणि दिव्यानि भरतर्षभ।
बहूनि बहुरूपाणि विरजांसि समाददे॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - भरतश्रेष्ठ, तत्पश्चात भीम ने अनेक प्रकार के बहुमूल्य, दिव्य और शुद्ध सुगन्धित कमल एकत्रित किए ॥1॥
 
Vaishampayanji says - Bharatashreshtha, thereafter Bhima collected many types of precious, divine and pure fragrant lotuses. 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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