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श्लोक 3.155.1  |
वैशम्पायन उवाच
ततस्तानि महार्हाणि दिव्यानि भरतर्षभ।
बहूनि बहुरूपाणि विरजांसि समाददे॥ १॥ |
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| अनुवाद |
| वैशम्पायनजी कहते हैं - भरतश्रेष्ठ, तत्पश्चात भीम ने अनेक प्रकार के बहुमूल्य, दिव्य और शुद्ध सुगन्धित कमल एकत्रित किए ॥1॥ |
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| Vaishampayanji says - Bharatashreshtha, thereafter Bhima collected many types of precious, divine and pure fragrant lotuses. 1॥ |
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