श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 154: भीमसेनके द्वारा क्रोधवश नामक राक्षसोंकी पराजय और द्रौपदीके लिये सौगन्धिक कमलोंका संग्रह करना  »  श्लोक 18-19
 
 
श्लोक  3.154.18-19 
ते तं तदा तोमरपट्टिशाद्यै-
र्व्याविद्धशस्त्रै: सहसा निपेतु:।
जिघांसव: क्रोधवशा: सुभीमा
भीमं समन्तात् परिवव्रुरुग्रा:॥ १८॥
वातेन कुन्त्यां बलवान् सुजात:
शूरस्तरस्वी द्विषतां निहन्ता।
सत्ये च धर्मे च रत: सदैव
पराक्रमे शत्रुभिरप्रधृष्य:॥ १९॥
 
 
अनुवाद
यह देखकर भीमसेन नामक राक्षस भयंकर क्रोध में भरकर उसे मार डालने की इच्छा से सहसा तोमर, पट्टिस आदि अस्त्र-शस्त्र लेकर उसकी ओर दौड़े। शत्रुओं के अस्त्र-शस्त्र नष्ट हो गए और उन्होंने उसे चारों ओर से घेर लिया। वे सब-के-सब बड़े भयंकर स्वभाव के थे। दूसरी ओर वायुदेवता द्वारा कुन्तीदेवी के गर्भ से उत्पन्न होने के कारण भीमसेन अत्यन्त बलवान, पराक्रमी, वेगवान और शत्रुओं का संहार करने में समर्थ थे। वे सदैव सत्य और धर्म में तत्पर रहते थे। वे इतने पराक्रमी थे कि अनेक शत्रु मिलकर भी उन्हें परास्त नहीं कर सकते थे॥18-19॥
 
Seeing this, the demons named Bhimasena, in a terrible rage, with the desire to kill him, suddenly ran towards him with weapons like tomar, pattis etc. which destroyed the weapons of the enemies and surrounded him from all sides. All of them were of very fierce nature. On the other hand, Bhimasena, being born from the womb of Kuntidevi by Vayu Devta, was very strong, valiant, swift and capable of killing his enemies. He was always devoted to truth and Dharma. He was so valiant that even many enemies together could not defeat him.॥18-19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)