श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 152: भीमसेनका सौगन्धिक वनमें पहुँचना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  3.152.14 
तद् दृष्ट्वा लब्धकाम: स मनसा पाण्डुनन्दन:।
वनवासपरिक्लिष्टां जगाम मनसा प्रियाम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
उस वन को देखकर पाण्डुपुत्र भीम के मन में ऐसा विचार आया कि मेरी मनोकामना पूर्ण हो गई। तब उन्हें वनवास के कष्टों से पीड़ित अपनी प्रियतमा द्रौपदी का स्मरण हुआ॥14॥
 
Seeing that forest, Bhima, the son of Pandu, felt in his heart that his wish had been fulfilled. Then he remembered his beloved Draupadi who was suffering from the pains of exile.॥ 14॥
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां सौगन्धिकाहरणे द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १५२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें सौगन्धिक कमलको लानेसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १५२॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)