श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 151: श्रीहनुमान‍्जीका भीमसेनको आश्वासन और विदा देकर अन्तर्धान होना  »  श्लोक 3-4
 
 
श्लोक  3.151.3-4 
बलं चातिबलो मेने न मेऽस्ति सदृशो महान्।
तत: पुनरथोवाच पर्यश्रुनयनो हरि:॥ ३॥
भीममाभाष्य सौहार्दाद् बाष्पगद्‍गदया गिरा।
गच्छ वीर स्वमावासं स्मर्तव्योऽस्मि कथान्तरे॥ ४॥
 
 
अनुवाद
अत्यन्त बलशाली भीमसेन को ऐसा लगा कि उनका बल बहुत बढ़ गया है। अब उनके समान महान् कोई नहीं है। तब हनुमानजी ने स्नेह और रुँधे हुए स्वर से भीमसेन को संबोधित करते हुए, नेत्रों में आँसू भरकर कहा - 'वीर! अब तुम अपने धाम जाओ। अपनी बातचीत के प्रसंग में मेरा भी स्मरण करते रहो॥ 3-4॥
 
The very powerful Bhimasena felt that his strength had increased a lot. Now there is no one as great as him. Then Hanumanji addressed Bhimasena with affection and choked voice, filling his eyes with tears and said - 'Valiant! Now you go to your abode. Keep remembering me also in the context of your conversation.॥ 3-4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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