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mahabharat 3.151.16-19: ‘हे पराक्रमी योद्धा! जब तुम बाणों और शक्ति के प्रहारों से व्याकुल शत्रु सेना में प्रवेश करके सिंह के समान गर्जना करोगे, तब मैं अपनी गर्जना से तुम्हारी गर्जना को बढ़ा दूँगा। इसके अतिरिक्त अर्जुन की ध्वजा पर बैठकर मैं शत्रुओं के प्राण हर लेने वाली ऐसी भयंकर गर्जना करूँगा, जिससे तुम उन्हें आसानी से मार सकोगे।’ पाण्डवों के हर्ष को बढ़ाने वाले भीमसेन से ऐसा कहकर हनुमानजी ने उन्हें जाने का मार्ग बताया और स्वयं वहीं अन्तर्धान हो गए। 16-19।   |   mahabharat अध्याय 3.151: श्रीहनुमान‍्जीका भीमसेनको आश्वासन और विदा देकर अन्तर्धान होना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 151: श्रीहनुमान‍्जीका भीमसेनको आश्वासन और विदा देकर अन्तर्धान होना  »  श्लोक 16-19
 
 
श्लोक  3.151.16-19 
चमूं विगाह्य शत्रूणां शरशक्तिसमाकुलाम्।
यदा सिंहरवं वीर करिष्यसि महाबल॥ १६॥
तदाहं बृंहयिष्यामि स्वरवेण रवं तव।
विजयस्य ध्वजस्थश्च नादान् मोक्ष्यामि दारुणान्॥ १७॥
शत्रूणां ये प्राणहरा: सुखं येन हनिष्यथ।
एवमाभाष्य हनुमांस्तदा पाण्डवनन्दनम्॥ १८॥
मार्गमाख्याय भीमाय तत्रैवान्तरधीयत॥ १९॥
 
 
अनुवाद
‘हे पराक्रमी योद्धा! जब तुम बाणों और शक्ति के प्रहारों से व्याकुल शत्रु सेना में प्रवेश करके सिंह के समान गर्जना करोगे, तब मैं अपनी गर्जना से तुम्हारी गर्जना को बढ़ा दूँगा। इसके अतिरिक्त अर्जुन की ध्वजा पर बैठकर मैं शत्रुओं के प्राण हर लेने वाली ऐसी भयंकर गर्जना करूँगा, जिससे तुम उन्हें आसानी से मार सकोगे।’ पाण्डवों के हर्ष को बढ़ाने वाले भीमसेन से ऐसा कहकर हनुमानजी ने उन्हें जाने का मार्ग बताया और स्वयं वहीं अन्तर्धान हो गए। 16-19।
 
'O mighty warrior! When you enter the enemy army, which is disturbed by the blows of arrows and Shakti, and roar like a lion, I will increase your roar with my roar. Apart from that, sitting on Arjun's flag, I will roar so fiercely that it will take away the lives of the enemies, so that you will be able to kill them easily.' After saying this to Bhimasena, who increased the joy of the Pandavas, Hanumanji showed him the way to go and himself disappeared there. 16-19.
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां गन्धमादनप्रवेशे हनुमद्भीमसंवादे एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १५१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें गन्धमादन पर्वतपर हनुमान‍्जी और भीमसेनका संवादविषयक एक सौ इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १५१॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)