श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 151: श्रीहनुमान‍्जीका भीमसेनको आश्वासन और विदा देकर अन्तर्धान होना  »  श्लोक 12-13
 
 
श्लोक  3.151.12-13 
वैशम्पायन उवाच
भीमसेनस्तु तद् वाक्यं श्रुत्वा तस्य महात्मन:।
प्रत्युवाच हनूमन्तं प्रहृष्टेनान्तरात्मना॥ १२॥
कृतमेव त्वया सर्वं मम वानरपुङ्गव।
स्वस्ति तेऽस्तु महाबाहो कामये त्वां प्रसीद मे॥ १३॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! महात्मा हनुमानजी के ये वचन सुनकर भीमसेन ने हर्षित मन से हनुमानजी से कहा- 'वानरशिरोमणे! आपने मेरे लिए यह सब कार्य पूर्ण किया है। आप धन्य हों। महाबाहो! अब मेरी आपसे यही कामना है कि आप मुझ पर प्रसन्न रहें- आपकी कृपा मुझ पर बनी रहे।॥ 12-13॥
 
Vaishmpayana says- Janamejaya! On hearing these words of Mahatma Hanuman, Bhimsena replied to Hanuman with a joyful heart- 'Vanarashiromane! You have completed all this work for me. May you be blessed. Mahabaho! Now my only wish from you is that you remain pleased with me- may your kindness remain with me.॥ 12-13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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