Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.150.9: 'अनघ! तुम यहाँ मेरा इतना ही बड़ा रूप देख सकते हो, परन्तु मैं इससे भी बड़ा हो सकता हूँ। तुम मेरे मन में जितना बड़ा रूप कल्पना करोगे, मैं उतना ही बड़ा हो सकता हूँ। भयंकर शत्रुओं के समीप मेरा रूप बड़े वेग से बढ़ता है।'॥9॥ | mahabharat अध्याय 3.150: श्रीहनुमान्जीके द्वारा भीमसेनको अपने विशाल रूपका प्रदर्शन और चारों वर्णोंके धर्मोंका प्रतिपादन । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
'अनघ! तुम यहाँ मेरा इतना ही बड़ा रूप देख सकते हो, परन्तु मैं इससे भी बड़ा हो सकता हूँ। तुम मेरे मन में जितना बड़ा रूप कल्पना करोगे, मैं उतना ही बड़ा हो सकता हूँ। भयंकर शत्रुओं के समीप मेरा रूप बड़े वेग से बढ़ता है।'॥9॥
'Anagh! You can see my form here only this big, but I can become even bigger than this. The bigger the form you imagine in my mind, the more I can grow. My form grows with great vigour near the dreadful enemies.'॥9॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥