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mahabharat 3.150.37: कुन्तीनन्दन! सबकी रक्षा करना क्षत्रिय का कर्तव्य है, अतः यही तुम्हारा भी कर्तव्य है। अपने धर्म का पालन करो। नम्र रहो और अपनी इन्द्रियों को वश में रखो। 37॥   |   mahabharat अध्याय 3.150: श्रीहनुमान‍्जीके द्वारा भीमसेनको अपने विशाल रूपका प्रदर्शन और चारों वर्णोंके धर्मोंका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  3.150.37 
क्षत्रधर्मोऽत्र कौन्तेय तव धर्मोऽत्र रक्षणम्।
स्वधर्मं प्रतिपद्यस्व विनीतो नियतेन्द्रिय:॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
कुन्तीनन्दन! सबकी रक्षा करना क्षत्रिय का कर्तव्य है, अतः यही तुम्हारा भी कर्तव्य है। अपने धर्म का पालन करो। नम्र रहो और अपनी इन्द्रियों को वश में रखो। 37॥
 
Kuntinandan! It is the duty of a Kshatriya to protect everyone, hence this is your duty also. Follow your religion. Remain humble and keep your senses under control. 37॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)