Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.150.27: कहीं-कहीं अधर्म को भी धर्म कहा गया है और कहीं-कहीं धर्म को भी अधर्म कहा गया है। अतः धर्म और अधर्म के स्वरूप का पृथक-पृथक ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। मूर्ख लोग इसी में भ्रमित हो जाते हैं॥ 27॥ | mahabharat अध्याय 3.150: श्रीहनुमान्जीके द्वारा भीमसेनको अपने विशाल रूपका प्रदर्शन और चारों वर्णोंके धर्मोंका प्रतिपादन । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
अधर्मो यत्र धर्माख्यो धर्मश्चाधर्मसंज्ञित:।
स विज्ञेयो विभागेन यत्र मुह्यन्त्यबुद्धय:॥ २७॥
अनुवाद
कहीं-कहीं अधर्म को भी धर्म कहा गया है और कहीं-कहीं धर्म को भी अधर्म कहा गया है। अतः धर्म और अधर्म के स्वरूप का पृथक-पृथक ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। मूर्ख लोग इसी में भ्रमित हो जाते हैं॥ 27॥
In some places, irreligion is called Dharma and in some places Dharma is also called Adharma. Therefore, one should acquire knowledge of the nature of Dharma and Adharma separately. The foolish people get confused in this.॥ 27॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥