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mahabharat 3.150.17: वैशम्पायनजी कहते हैं: हे जनमेजय! भीम के ऐसा कहने पर वानरश्रेष्ठ हनुमानजी ने स्नेह से युक्त गम्भीर स्वर में इस प्रकार कहा:॥17॥   |   mahabharat अध्याय 3.150: श्रीहनुमान‍्जीके द्वारा भीमसेनको अपने विशाल रूपका प्रदर्शन और चारों वर्णोंके धर्मोंका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 150: श्रीहनुमान‍्जीके द्वारा भीमसेनको अपने विशाल रूपका प्रदर्शन और चारों वर्णोंके धर्मोंका प्रतिपादन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.150.17 
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु भीमेन हनूमान् प्लवगोत्तम:।
प्रत्युवाच ततो वाक्यं स्निग्धगम्भीरया गिरा॥ १७॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं: हे जनमेजय! भीम के ऐसा कहने पर वानरश्रेष्ठ हनुमानजी ने स्नेह से युक्त गम्भीर स्वर में इस प्रकार कहा:॥17॥
 
Vaishmpayana says: O Janamejaya! When Bhima said this, the best of the apes, Hanuman, replied in a serious tone full of affection as follows:॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)