श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 150: श्रीहनुमान‍्जीके द्वारा भीमसेनको अपने विशाल रूपका प्रदर्शन और चारों वर्णोंके धर्मोंका प्रतिपादन  »  श्लोक 10-11
 
 
श्लोक  3.150.10-11 
वैशम्पायन उवाच
तदद्‍भुतं महारौद्रं विन्ध्यपर्वतसंनिभम्।
दृष्ट्वा हनूमतो वर्ष्म सम्भ्रान्त: पवनात्मज:॥ १०॥
प्रत्युवाच ततो भीम: सम्प्रहृष्टतनूरुह:।
कृताञ्जलिरदीनात्मा हनूमन्तमवस्थितम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! हनुमानजी का विन्ध्य पर्वत के समान अत्यंत भयंकर एवं अद्भुत शरीर देखकर वायुपुत्र भीमसेन भयभीत हो गए। उनके शरीर में रोंगटे खड़े होने लगे। उस समय उदार हृदय वाले भीमसेन ने हाथ जोड़कर अपने सामने खड़े हनुमानजी से कहा -॥10-11॥
 
Vaishmpayana says - Janamejaya! Seeing Hanuman's extremely fearsome and amazing body like the Vindhya mountain, Vayu's son Bhimsena got frightened. His body started getting goosebumps. At that time, the generous-hearted Bhima folded his hands and said to Hanuman standing in front of him -॥10-11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)