श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 149: हनुमान‍्जीके द्वारा चारों युगोंके धर्मोंका वर्णन  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  3.149.6 
न तच्छक्यं त्वया द्रष्टुं रूपं नान्येन केनचित्।
कालावस्था तदा ह्यन्या वर्तते सा न साम्प्रतम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
‘भैया! वह रूप तुम्हें नहीं दिखता, दूसरा कोई भी उसे नहीं देख सकता। उस समय की स्थिति भिन्न थी, अब वह नहीं है।॥6॥
 
‘Bhaiya! You cannot see that form, no other person can see it either. The condition at that time was different, it is not there now.॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)