श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 149: हनुमान‍्जीके द्वारा चारों युगोंके धर्मोंका वर्णन  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  3.149.39 
यच्च ते मत्परिज्ञाने कौतूहलमरिंदम।
अनर्थकेषु को भाव: पुरुषस्य विजानत:॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
हे शत्रुओं का नाश करनेवाले! मेरे मूल स्वरूप को देखने या जानने की जो जिज्ञासा आपने उत्पन्न की है, वह अच्छी नहीं है। कोई भी समझदार व्यक्ति व्यर्थ की बातों पर क्यों जोर देता है?॥39॥
 
O destroyer of enemies! The curiosity you have developed to see or know my original form is not good. Why should any sensible person insist on useless matters?॥ 39॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)