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mahabharat 3.149.25: त्रेतायुग में ही यज्ञ, धर्म और नाना प्रकार के शुभ कर्मों का प्रारंभ होता है। मनुष्य अपनी भावना और संकल्प के अनुसार वेदविहित कर्मों और दान आदि के द्वारा मनोवांछित फल प्राप्त करते हैं। 25॥   |   mahabharat अध्याय 3.149: हनुमान‍्जीके द्वारा चारों युगोंके धर्मोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 149: हनुमान‍्जीके द्वारा चारों युगोंके धर्मोंका वर्णन  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  3.149.25 
ततो यज्ञा: प्रवर्तन्ते धर्माश्च विविधा: क्रिया:।
त्रेतायां भावसंकल्पा: क्रियादानफलोपगा:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
त्रेतायुग में ही यज्ञ, धर्म और नाना प्रकार के शुभ कर्मों का प्रारंभ होता है। मनुष्य अपनी भावना और संकल्प के अनुसार वेदविहित कर्मों और दान आदि के द्वारा मनोवांछित फल प्राप्त करते हैं। 25॥
 
Yagya, religion and various types of good deeds begin in Tretayuga itself. According to their feelings and determination, people get the desired results through actions and donations etc. as prescribed in the Vedas. 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)