Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.149.14: ऋक्, साम और यजुर्वेद के मन्त्रवर्णों का पृथक् विभाग नहीं था। उस समय कोई मानवीय कर्म (कृषि आदि) नहीं था। उस समय केवल विचार करने मात्र से ही सभी को मनोवांछित फल की प्राप्ति हो जाती थी। सत्ययुग में केवल एक ही धर्म था, स्वार्थ का त्याग ॥14॥ | mahabharat अध्याय 3.149: हनुमान्जीके द्वारा चारों युगोंके धर्मोंका वर्णन । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
न सामऋग्यजुर्वर्णा: क्रिया नासीच्च मानवी।
अभिध्याय फलं तत्र धर्म: संन्यास एव च॥ १४॥
अनुवाद
ऋक्, साम और यजुर्वेद के मन्त्रवर्णों का पृथक् विभाग नहीं था। उस समय कोई मानवीय कर्म (कृषि आदि) नहीं था। उस समय केवल विचार करने मात्र से ही सभी को मनोवांछित फल की प्राप्ति हो जाती थी। सत्ययुग में केवल एक ही धर्म था, स्वार्थ का त्याग ॥14॥
There was no separate division of Mantravarnas of Rik, Sama and Yajurveda. There was no human activity (agriculture etc.) At that time, just by thinking, everyone would get the desired result. There was only one religion in Satyayuga, renunciation of selfishness. 14॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥