श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 149: हनुमान‍्जीके द्वारा चारों युगोंके धर्मोंका वर्णन  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  3.149.1-2 
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तो महाबाहुर्भीमसेन: प्रतापवान्।
प्रणिपत्य तत: प्रीत्या भ्रातरं हृष्टमानस:॥ १॥
उवाच श्लक्ष्णया वाचा हनूमन्तं कपीश्वरम्।
मया धन्यतरो नास्ति यदार्यं दृष्टवानहम्॥ २॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! हनुमानजी की यह बात सुनकर महाबली भीमसेन अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने अपने भाई वानरराज हनुमानजी को बड़े प्रेम से प्रणाम किया और मधुर वाणी में बोले - 'अहा! आज मेरे समान कोई भी भाग्यशाली नहीं है; क्योंकि आज मैंने अपने बड़े भाई के दर्शन किये हैं।॥1-2॥
 
Vaishampayana says - Janamejaya! On hearing Hanuman say this, the mighty warrior Bhimasena was very happy. He bowed to his brother Hanuman, the king of monkeys, with great love and said in a sweet voice - 'Aha! Today no one is as fortunate as me; because today I have seen my elder brother.॥ 1-2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)