श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 148: हनुमान‍्जीका भीमसेनको संक्षेपसे श्रीरामका चरित्र सुनाना  »  श्लोक 21-22
 
 
श्लोक  3.148.21-22 
अयं च मार्गो मर्त्यानामगम्य: कुरुनन्दन।
ततोऽहं रुद्धवान् मार्गं तवेमं देवसेवितम्॥ २१॥
धर्षयेद् वा शपेद् वापि मा कश्चिदिति भारत।
दिव्यो देवपथो ह्येष नात्र गच्छन्ति मानुषा:।
यदर्थमागतश्चासि अत एव सरश्च तत्॥ २२॥
 
 
अनुवाद
कुरुनंदन! यह मार्ग मनुष्यों के लिए दुर्गम है। इसलिए मैंने तुम्हारे लिए देवताओं द्वारा पूजित इस मार्ग को अवरुद्ध कर दिया था, जिससे यदि तुम इस मार्ग से जाओ तो कोई तुम्हारा अपमान या शाप न दे; क्योंकि यह देवताओं का दिव्य मार्ग है। इस पर मनुष्य नहीं चलते। भरत! जिस सरोवर में तुम जाने के लिए आए हो, वह यहीं है। 21-22।
 
Kuru Nandan! This path is inaccessible for humans. Therefore, I had blocked this path served by the gods for you so that if you go through this path, no one may insult you or curse you; because this is a divine path of the gods. Humans do not go on it. Bharat! The lake where you have come to go is right here. 21-22.
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां हनुमद्भीमसंवादे अष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १४८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें हनुमान‍्जी और भीमसेनका संवाद नामक एक सौ अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १४८॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)