श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 147: श्रीहनुमान् और भीमसेनका संवाद  »  श्लोक 33-34
 
 
श्लोक  3.147.33-34 
तस्य भार्या जनस्थानाच्छलेनापहृता बलात्।
राक्षसेन्द्रेण बलिना रावणेन दुरात्मना॥ ३३॥
सुवर्णरत्नचित्रेण मृगरूपेण रक्षसा।
वञ्चयित्वा नरव्याघ्रं मारीचेन तदानघ॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
अनघ! दण्डकारण्य में आकर वह जनस्थान में रहने लगा था। एक दिन अत्यन्त बलवान दुष्ट राक्षसराज रावण ने माया से सुवर्ण और मणियों से विभूषित विचित्र मृग का रूप धारण करने वाले मारीच नामक राक्षस के द्वारा पुरुषोत्तम श्री राम को छलकर उनकी पत्नी सीता को बलपूर्वक हर लिया। 33-34॥
 
Anagh! After coming to Dandakaranya, he used to live in Janasthan. One day, the extremely powerful evil demon king Ravana deceived the best of men Shri Ram and took away his wife Sita by force through a demon named Marich, who took the form of a strange deer adorned with gold and jewels by Maya. 33-34॥
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां हनुमद्भीमसंवादे सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १४७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें हनुमान‍्जी और भीमसेनका संवादविषयक एक सौ सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १४७॥

 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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