श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 147: श्रीहनुमान् और भीमसेनका संवाद  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  3.147.25 
न चेद् गुह्यं महाबाहो श्रोतव्यं चेद् भवेन्मम।
शिष्यवत् त्वां तु पृच्छामि उपपन्नोऽस्मि तेऽनघ॥ २५॥
 
 
अनुवाद
महाबाहो! यदि कोई रहस्य न हो और वह मेरे सुनने योग्य हो, तो कृपया मुझे बताइए। अनघ! मैं आपकी शरण में आया हूँ और शिष्य के रूप में आपसे पूछ रहा हूँ। अतः कृपया मुझे बताइए।॥25॥
 
‘Mahabaho! If there is no secret and it is worth listening to me, then please tell me. Anagh! I have come to your refuge and I am asking you as a disciple. So please do tell me.’॥ 25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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