श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 147: श्रीहनुमान् और भीमसेनका संवाद  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  3.147.15 
वैशम्पायन उवाच
विज्ञाय तं बलोन्मत्तं बाहुवीर्येण दर्पितम्।
हृदयेनावहस्यैनं हनूमान् वाक्यमब्रवीत्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! भीमसेन को अपने बल के अभिमान से उन्मत्त और अपनी भुजाओं के बल से मदमस्त जानकर हनुमानजी ने मन ही मन उनका उपहास किया और उनसे इस प्रकार कहा॥15॥
 
Vaishmpayana says: Janamejaya! Knowing that Bhimasena was mad with pride of his strength and full of arrogance due to the might of his arms, Hanuman mocked him in his mind and said to him thus.॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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