श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 146: भीमसेनका सौगन्धिक कमल लानेके लिये जाना और कदलीवनमें उनकी हनुमान‍्जीसे भेंट  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  3.146.58 
काञ्चनै: कदलीषण्डैर्मन्दमारुतकम्पितै:।
वीज्यमानमिवाक्षोभ्यं तीरात् तीरविसर्पिभि:॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
झील के एक किनारे से दूसरे किनारे तक फैले हुए सुनहरे केले के वृक्ष मंद-मंद हवा में झूमते हुए ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानो वे उस अथाह जल-भण्डार को पंखा झल रहे हों।
 
The golden banana trees spread from one bank of the lake to the other, swaying in the gentle breeze, seemed as if they were fanning that unfathomable reservoir of water. 58.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)