| श्री महाभारत » पर्व 3: वन पर्व » अध्याय 145: घटोत्कच और उसके साथियोंकी सहायतासे पाण्डवोंका गन्धमादन पर्वत एवं बदरिकाश्रममें प्रवेश तथा बदरीवृक्ष,नर-नारायणाश्रम और गंगाका वर्णन » श्लोक 50-54 |
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| | | | श्लोक 3.145.50-54  | भागीरथीं सुतीर्थां च शीतां विमलपङ्कजाम्।
मणिप्रवालप्रस्तारां पादपैरुपशोभिताम्॥ ५०॥
दिव्यपुष्पसमाकीर्णां मन:प्रीतिविवर्धिनीम्।
वीक्षमाणा महात्मानो विशालां बदरीमनु॥ ५१॥
तस्मिन् देवर्षिचरिते देशे परमदुर्गमे।
भागीरथीपुण्यजले तर्पयांचक्रिरे तदा॥ ५२॥
देवानृषींश्च कौन्तेया: परमं शौचमास्थिता:।
तत्र ते तर्पयन्तश्च जपन्तश्च कुरूद्वहा:॥ ५३॥
ब्राह्मणै: सहिता वीरा ह्यवसन् पुरुषर्षभा:।
कृष्णायास्तत्र पश्यन्त: क्रीडितान्यमरप्रभा:।
विचित्राणि नरव्याघ्रा रेमिरे तत्र पाण्डवा:॥ ५४॥ | | | | | | अनुवाद | | उपर्युक्त विशाल बद्री वृक्ष के निकट उत्तम तीर्थों से सुशोभित शीतल जल वाली गंगा भागीरथी प्रवाहित हो रही थी। उसमें सुन्दर कमल खिले हुए थे। उसके तट रत्नों और मूंगों से सुशोभित थे। नाना प्रकार के वृक्ष उसके तटों की शोभा बढ़ा रहे थे। वह दिव्य पुष्पों से आच्छादित थी और हृदय के आनन्द को बढ़ा रही थी। उसे देखकर महाबली पाण्डवों ने देवताओं के ऋषियों द्वारा सेवित उस अत्यन्त दुर्गम क्षेत्र में भागीरथी के पवित्र जल में निवास किया और अत्यन्त पवित्रता के साथ देवताओं, ऋषियों और पितरों का तर्पण किया। इस प्रकार प्रतिदिन तर्पण और जप आदि करते हुए, पुरुषों में श्रेष्ठ और कुरुवंश के रत्न, वीर पाण्डव ब्राह्मणों के साथ वहाँ रहने लगे। देवताओं के समान तेजस्वी पाण्डव द्रौपदी की विचित्र क्रीड़ाओं को देखते हुए वहाँ आनन्दपूर्वक रहने लगे। | | | | Near the aforementioned huge Badri tree, the cool water Ganges Bhagirathi, adorned with the best pilgrimage sites, was flowing. Beautiful lotuses were blooming in it. Its banks were adorned with gems and corals. Many kinds of trees were adding to the beauty of its banks. It was covered with divine flowers and was increasing the joy of the heart. After seeing it, the great Pandavas, in that extremely inaccessible region served by the sages of the gods, settled in the holy water of Bhagirathi and performed the oblations of the gods, sages and ancestors with utmost purity. Thus, performing oblations and chanting etc. daily, the brave Pandavas, the best of men and the jewel of the Kuru clan, started living there with the Brahmins. The Pandavas, as radiant as the gods, started enjoying themselves there, watching the strange sports of Draupadi. | | | इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां गन्धमादनप्रवेशे पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १४५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें गन्धमादनप्रवेशविषयक एक सौ पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १४५॥
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