श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 145: घटोत्कच और उसके साथियोंकी सहायतासे पाण्डवोंका गन्धमादन पर्वत एवं बदरिकाश्रममें प्रवेश तथा बदरीवृक्ष,नर-नारायणाश्रम और गंगाका वर्णन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.145.5 
स्कन्धमारोप्य भद्रं ते मध्येऽस्माकं विहायसा।
गच्छ नीचिकया गत्या यथा चैनां न पीडये:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
बेटा! तुम्हारा कल्याण हो। इसे अपने कंधों पर उठाकर हमारे बीच रहकर धीरे-धीरे आकाशमार्ग पर ले चलो, जिससे इसे किंचित मात्र भी कष्ट न सहना पड़े॥5॥
 
Son! May you be blessed. Carry him on your shoulders and take him along the sky path slowly and slowly while staying amongst us, so that he does not have to suffer even a little.॥ 5॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas