श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 145: घटोत्कच और उसके साथियोंकी सहायतासे पाण्डवोंका गन्धमादन पर्वत एवं बदरिकाश्रममें प्रवेश तथा बदरीवृक्ष,नर-नारायणाश्रम और गंगाका वर्णन  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  3.145.49 
पुण्यगन्ध:सुखस्पर्शो ववौ तत्र समीरण:।
ह्लादयन् पाण्डवान् सर्वान् द्रौपद्या सहितान् प्रभो॥ ४९॥
 
 
अनुवाद
जनमेजय! गन्धमादन पर्वत पर पवित्र सुगन्ध से युक्त सुखद वायु बह रही थी, जिसने द्रौपदी सहित पाण्डवों को आनन्द में डुबो दिया॥49॥
 
Janamejaya! A pleasant breeze filled with sacred fragrance was blowing on Gandhamadan mountain, which immersed the Pandavas along with Draupadi in joy. 49॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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