श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 145: घटोत्कच और उसके साथियोंकी सहायतासे पाण्डवोंका गन्धमादन पर्वत एवं बदरिकाश्रममें प्रवेश तथा बदरीवृक्ष,नर-नारायणाश्रम और गंगाका वर्णन  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  3.145.47 
स्निग्धपत्रैरविरलै: शीतच्छायैर्मनोरमै:।
सरांसि च विचित्राणि प्रसन्नसलिलानि च॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
उपर्युक्त वृक्षों के पत्ते चिकने और घने थे। उनकी छाया शीतल थी। वे मन को बहुत सुखद लगते थे। उस वन में अनेक विचित्र झीलें थीं, जो स्वच्छ जल से भरी हुई थीं। 47.
 
The leaves of the above mentioned trees were smooth and dense. Their shade was cool. They seemed very pleasant to the mind. There were many strange lakes in that forest, which were filled with clean water. 47.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd