श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 145: घटोत्कच और उसके साथियोंकी सहायतासे पाण्डवोंका गन्धमादन पर्वत एवं बदरिकाश्रममें प्रवेश तथा बदरीवृक्ष,नर-नारायणाश्रम और गंगाका वर्णन  »  श्लोक 39-40
 
 
श्लोक  3.145.39-40 
तं शक्रसदनप्रख्यं दिव्यगन्धं मनोरमम्।
प्रीत: स्वर्गोपमं पुण्यं पाण्डव: सह कृष्णया॥ ३९॥
विवेश शोभया युक्तं भ्रातृभिश्च सहानघ।
ब्राह्मणैर्वेदवेदाङ्गपारगैश्च सहस्रश:॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
वे अपने भाइयों और द्रौपदी के साथ उस स्वर्ग के समान पुण्यशाली नर-नारायण आश्रम में प्रविष्ट हुए, जो इन्द्रभवन के समान मनोहर और दिव्य सुगन्ध से परिपूर्ण था। अनघ! उनके साथ वेद-वेदांगों के ज्ञाता सहस्रों ब्राह्मण भी प्रविष्ट हुए। 39-40॥
 
He, along with his brothers and Draupadi, entered that heaven-like, virtuous Nar-Narayan Ashram, as captivating as Indra Bhavan and filled with divine fragrance. Anagh! Along with them, thousands of Brahmins who were experts in Vedas and Vedangas also entered. 39-40॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas